चोल साम्राज्य में साहित्य, धर्म एवं कला

चोल साम्राज्य में साहित्य, धर्म एवं कला 

साहित्य

तमिल साहित्य में कंबन ने रामायण, पुगालिंदी ने नलबेंबा, ज्ञानगोंदुर ने कल्लादानर की रचना की। जयागोंदानकुलोत्तुंग प्रथम के राजकवि थे। इनकी रचना कलिंगन्तुपणीं थी। सेक्कीललार कुलोत्तुंग प्रथम के दरबार में रहता था। उसने पेरीयापुराणम की रचना की। वेंकट माधव ने परांतक प्रथम के संरक्षण में ऋग्र्थदीपिका की रचना की। चोल शासक वीर राजेन्द्र को भी महान् तमिल विद्वान् बताया गया है।

धर्म

इस काल में बौद्ध धर्म का ह्रास होने लगा। पाल शासक बौद्ध धर्म के थे और उनके काल में बंगाल में इस धर्म का प्रभाव बना रहा। पाल राजाओं के पतन के बाद बौद्ध धर्म का भी पतन हो गया और बौद्ध धर्म अपने देश से ही समाप्त हो गया।

जैन धर्म की स्थिति, बौद्ध धर्म की अपेक्षा अच्छी थी। यद्यपि उत्तर भारत में इसकी लोकप्रियता कम हो गई परन्तु पश्चिम और दक्षिण भारत में यह लोकप्रिय बना रहा और इसे राजाश्रय प्राप्त हुआ। चालुक्य शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया और आबू पर्वत पर मंदिरों का निर्माण कराया। नवीं और दसवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जैन धर्म का बड़ा प्रचार हुआ। कर्नाटक के गांग शासकों ने जैन धर्म को प्रोत्साहन दिया। जैन धर्म की एक विशेषता यह रही है की समय के अनुसार वन अपने को ढालता रहा है और ब्राह्मण धर्म के काफी निकट गया। यही कारण है की बौद्ध धर्म अपने देश में भी मृत हो गया, जबकि जैन धेम आज भी जीवित-जागृत धर्म है।

इस काल में हिन्दू धर्म की उन्नति हुई। शिव और विष्णु प्रमुख देवता बन गए। शिव और विष्णु के अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया। इसी काल में शक्तिपूजा का प्रचलन भी बढ़ा। शक्ति की चंडी, महाकाली, दुर्गा आदि विभिन्न रूपों में उपासना की गयी और इन मंदिरों का निर्माण किया गया। त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) गणेश और सूर्य मंदिरों का भी निर्माण किया गया। विभिन्न देवी-देवताओं का प्रचलन होते हुए भी धार्मिक क्षेत्र में सहिष्णुता की भावना बनी रही। अलवार और नयनार संतों ने भक्ति आंदोलन प्रारम्भ किया। विष्णु उपासक अलवार एवं शिव उपासक नयनार कहलाते थे।

शंकराचार्य ने हिन्दू दर्शन की पुनर्व्याख्या की और अद्वैतवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उन्होंने बौद्ध और जैन धर्म को चुनौती दी और अनेक बार शास्त्रार्थ किये। शांकराचार्य के वेदान्त का दर्शन जनसाधारण की समझ में सका। ग्यारहवीं शताब्दी में रामानुज ने अद्वैतवाद के स्थान पर द्वैतवाद के सिद्धांत का प्रचार किया और दक्षिण भारत में भक्ति-आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। यह आन्दोलन आगे चलकर उत्तरी भारत में बड़ा लोकप्रिय हुआ। बारहवीं शताब्दी में एक और आन्दोलन आरम्भ हुआ जिसे लिंगायत कहते हैं। लिंगायत संप्रदाय की स्थापनाबासव ने की। इस संप्रदाय का वर्णन बासव पुराण में किया गया। लिंगायत शिव के उपासक थे और मुक्ति प्राप्त करने के लिए भक्ति को आवश्यक मानते थे। इन्होंने जातिप्रथा की आलोचना की और उपवास तथा बलिप्रथा को निरर्थक बताया।

शैव धर्म- माना जाता है कि कुल 63 नैयनार सन्त हुए। प्रथम नैयनार सन्त अप्पर थे। इनके बाद नानसंबंदर आये। ये तंजौर जिले के सिजली नामक स्थान पर पैदा हुए थे। ये कौन्डिन्य गोत्रीय ब्राह्मण थे। ये राजराज एवं राजेन्द्र चोल के समकालीन थे। तिरूमूलर एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। उन्होंने तेवारम और तिरूव्राचलर की रचना थी। सुन्दर मूर्ति एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे। इनको शिव के प्रति वैसी ही भक्ति थी जैसे किसी घनिष्ठ मित्र के प्रति होती है। इसलिए उन्हें तम्बिरानतोलन (ईश्वर मित्र) की उपाधि दी गई। नबिअंडारनबि भी एक महत्त्वपूर्ण सन्त थे उन्होंने तिरुमुराई का संकलन किया। तिरुमुराई को पंचम वेद भी कहा जाता है और नबिअंडारनबि को तमिल व्यास कहा जाता है। अधिकतर चोल शासक कट्टर शैव थे। आदित्यचोल ने कावेरी नदी के दोनों किनारे शैव मंदिर स्थापित करवाये थे। राजाराम प्रथम ने वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था और शिवपाद शेखर की उपाधि ली थी। राजाराज प्रथम एवं राजेन्द्र प्रथम के समय इशानशिव और सर्वशिव जैसे शैव मंत्री नियुक्त हुए।

वैष्णव धर्म- इस आन्दोलन के भावनात्मक पक्ष का प्रतिनिधित्व 12 अल्वार संतों ने किया। अल्वार का अर्थ होता है ईश्वर के गुणों में डूबाने वाला।

महत्त्वपूर्ण सन्त- प्रारम्भिक अल्वार संत पोयगई था। दूसरे तिरूमलिशई, तीसरे तिरूमंगई एवं चौथे पेरिपालवार हुए। केरल के शासक कुलशेखर भी अलवार थे। अलवारों में एक मात्र महिला अंदाल थी। आचायों ने अलवारों की व्यक्तिगत भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। भक्ति का समन्वय कर्म एवं ज्ञान से हो गया।

सबसे पहला आचार्य नाथमुनी थे जिन्होंने न्याय तत्व की रचना की। परम्परा के अनुसार, वे श्रीरंग मंदिर में भगवान की मूर्ति में प्रवेश कर गए। यमुनाचार्य ने आगमों की महत्ता को प्रतिष्ठित किया और उन्हें वेदों का समकक्ष माना।

रामानुज- ये यमुनाचार्य के शिष्य थे। इनका जन्म कांची के पास पेरम्बदुर में हुआ। उन्होंने श्री भाष्य नामक ग्रन्थ की रचना की और विशिष्टताद्वैत का दर्शन दिया। रामानुज पूर्व मीमांसा एवं उत्तर मीमांसा में कोई अन्तर नहीं समझते थे। उनके विचार में उत्तर मीमांसा के अध्ययन से पहले पूर्व मीमांसा का अध्ययन आवश्यक है। वे सामान्य एवं विशेष भक्ति में अन्तर स्थापित करते हैं और ऐसा कहते हैं कि सामान्य भक्ति ईश्वर का निरन्तर ध्यान है एवं विशेष भक्ति ईश्वर के स्वरूप का ज्ञान है। माना जाता है कि चोल शासकों से उनका मतभेद हो गया (कुलोत्तुंग प्रथम एवं कुलोत्तुंग द्वितीय), इन्हें कुलोत्तुंग प्रथम के विरोध का सामना करना पड़ा, उन्हें श्रीरंगम् छोड़ना पड़ा। माना जाता है जब कुलोत्तुंग द्वितीय ने गोविन्दराज की मूर्ति को फिकवा दिया था तो रामानुज ने उसे तिरुपति के मंदिर में स्थापित किया। रामानुज ने भक्ति संप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के बीच सेतु का कार्य किया। यद्यपि रामानुज उच्चवर्ग के लिए विशेषाधिकार चाहते थे किन्तु वे शूद्रों को मंदिर प्रवेश से वर्जित नहीं करते थे।

निम्बाकाचार्य- रामानुज के समकालीन थे, उनका जन्म बेलारी जिला के निम्बापुर गाँव में हुआ था। वे तेलुगु ब्राह्मण थे किन्तु उनका अधिकांश समय वृन्दावन में बीता।

माधवाचार्य- इनका जन्म दक्षिणी कन्नड़ जिले के उदिची तालुक में हुआ था। इन्हें वायु का अवतार माना गया है। तेरहवीं एवं चौदहवीं सदी में रामानुज के अनुयायियों में फूट पड़ गई। उत्तरी शाखा बडगलई एवं दक्षिणी शाखा तेंगलई कहलायी। वडगलई-तमिल भाषा का प्रयोग करते थे जबकि तेंगलई-संस्कृत भाषा का प्रयोग करते थे। वैष्णव एवं शैव मतों का व्यापक प्रचार हुआ। इसमें अलवारों एवं नयनारों की प्रबल भूमिका थी। अधिकतर चोल कट्टर शैव थे चोल नरेश आदित्य प्रथम ने कावेरी के किनारे शिव मंदिर का निर्माण कराया। शैव संत नंबी अंदाल नंबी ने शैवमंत्रों को धार्मिक ग्रंथों में शामिल किया। ये राजराज प्रथम एवं राजेन्द्र के समकालीन थे। परांतक प्रथम ने दभ्रसभा का निर्माण किया। वैष्णव मत के प्रमुख आचार्य काफी समय तक श्रीरंग मंदिर में रहे, उन्होंने विशिष्टाद्वैत मत का प्रचार किया। कुलोत्तुंग द्वितीय चिदम्बरम मंदिर से गोविन्दराज विष्णु की मूर्ति को समुद्र में फिंकवा दिया। इसे रामानुज ने पुन: उठाकर इसे तिरुपति के विशाल वैष्णव मंदिर में स्थापित कराया। रामानुजाचार्य ने भक्तिसंप्रदाय एवं हिन्दू धर्म के मध्य सेतु का काम किया। 13वीं सदी में कन्नड़ में धर्मोपदेश देने वाले माधव ने भी धर्म के साथ भक्ति का संतुलन बैठने की कोशिश की। माधव के अनुसार, विष्णु अपने भक्तों पर अनुग्रह अपने पुत्र वायु देवता द्वारा करते हैं। रामानुजाचार्य उच्च वेर्न हेतु विशेष सुविधा स्वीकार करते हुए भी इस बात के विरुद्ध थे की शूद्रों को मंदिर में प्रवेश से वंचित किया जाए। धवलेश्वरम से चोलों के स्वर्ण सिक्के के ढेर मिलें हैं।

चोल कला

चोल कला की विशेषताएं मंडप, विमान, गोपुरम थी। चोल कला द्रविड़ शैली पर आधारित थी। चोल स्थापत्य की प्रशंसा करते हुए फर्ग्युसन ने कहा है की चोल्कलिन कारीगर राक्षस की तरह सोचते थे एवं जौहरी की तरह तराशते थे। प्रारंभिक मंदिरों में तिरुकट्टालाई का सुन्दरेश्वर मंदिर था। रतमलाई में विजयालय चोलेश्वर मंदिर भी स्थापत्य का सुन्दर उदाहरण है। राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर मंदिर/वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। पर्सी ब्राउन ने इस वृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है जबकि गंगैकोंडचोलपुरम के वृहदेश्वर मंदिर का निर्माण राजेन्द्र प्रथम द्वारा कराया गया। पर्सी ब्राउन ने इस मंदिर को गीतों की तरह संवेदना उत्पन्न करने वाला महान् कलात्मक निर्माण कहा है। अन्य मंदिरों में तंजौर स्थित दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर है। चोलकाल में मूर्तिकला का भी विकास हुआ। तंजौर स्थित नटराज शिव की कांस्य मूर्ति इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। पार्वती स्कंद में कार्तिकेय एवं गणेश आदि देवताओं की कांस्य मूर्तियाँ भी निर्मित की गई। भित्ति चित्रकला में वृहदेश्वर मंदिर के दीवारों पर अजंता की चित्रकला का प्रभाव दिखाई देता है।

इस प्रकार नवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच का यह काल आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से बड़ा महत्त्वपूर्ण है। इस समय देश में सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में महान् परिवर्तन हुए। अनेक मन्दिरों के निर्माण से कला को प्रोत्साहन मिला।

प्राचीन काल में हिन्दू समाज चार वर्गों- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में विभाजित था। इस काल में समाज में अनेक जातियां और उपजातियां हो गयीं। अनेक जातियां पेशों के आधार पर बन गयीं, जैसे लोहे का काम करने वाला लुहार, सोने का काम करने वाला स्वर्णकार, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई और चमड़े का काम करने वाला चर्मकार कहलाया। अनुलोम और प्रतिलोम विवाह के कारण भी मिश्रित जातियां बनीं। अनुलोम विवाह वह विवाह था जिसमे पिता की जाति ऊंची और माता की जाति नीची हो। जब ऊंची जाति की कन्या अपने से नीची जाति के लड़के से विवाह करती थी तो उसे प्रतिलोम विवाह कहते थे।

समाज में ब्राह्मण का ऊँचा स्थान था। दक्षिण भारत में बल्लालो का भी भी स्थान ऊपर था। ब्राह्मण भी अनेक समूह में विभाजित हो गये, जैसे सारस्वत, सरयूपारी, पाठक, शुक्ल, अग्निहोत्री, द्विवेदी, चतुर्वेदी इत्यादि। ब्राह्मणों का मुख्य कार्य पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान कराना और मन्दिरों में पुरोहित का कार्य करना था। ब्राह्मणों के बाद क्षत्रियों का स्थान था जिन्हें राजपूत कहा जाता था। इनका कार्य देश की रक्षा करना, प्रशासन चलाना और युद्ध करना आदि था। वैश्यों का कार्य व्यापार, दुकानदारी और खेती-बाड़ी करना था। इन तीनों वर्गों को द्विज के नाम से जाना जाता था। शूद्रों का क्षेत्र सेवा-कार्य करना था। समाज में इनकी दशा शोचनीय थी। एक नई जाति का उदय हुआ जिसे कायस्थ कहते थे। नवीं शताब्दी के आरम्भ में कायस्थ कर्मचारी के लिये प्रयुक्त होता था। परन्तु बारहवीं शताब्दी में कायस्थ एक जाति के रूप में माने जाने लगे। जाति का विभाजन बलंगै (दायीं भुजा वाले) और इलंगै (बायीं भुजा वाले) में भी होता था। इन दोनों में क्रमश: 98-98 जातियाँ थीं। इन वर्गों में वलंगै के पास विशेषाधिकार थे। इन दोनों के बीच कभी-कभी संघर्ष भी छिड़ जाते थे। ऐसा ही एक संघर्ष कुलोत्तुंग के समय हुआ था। ब्राह्मण और बल्लाल जो समाज में सबसे महत्त्वपूर्ण थे, वलंगै जातियों का समर्थन करते थे क्योंकि ये जातियां किसी किसी रूप में कृषि उत्पादन से संबंधित थीं। इलंगै जातियों में कम्माल जाति अपनी आर्थिक उपयोगिता के कारण सबसे महत्त्वपूर्ण थी। चोल सम्राटों ने उनकी आर्थिक उपयोगिता देखते हुए उन्हें यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार दिया। इलंगै जातियों को अधिक कर देना पड़ता था। इस तरह हम देखते हैं कि समकालीन दक्षिण भारत में सामाजिक जीवन का आधार आर्थिक था।

हिन्दू समाज में जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक संस्कारों का प्रचलन था। इनमें विवाह संस्कार प्रमुख था। आम तौर पर सजातीय विवाह होते थे, परन्तु अन्तर्जातीय विवाह का भी प्रचलन था। एक गोत्र के लोगों में विवाह अमान्य था। आमतौर पर पुरुष एक पत्नी रखते थे, परन्तु राजाओं और सामन्तों में बहु-विवाह का प्रचलन था। लोग शाकाहारी थे, परन्तु राजपूतों में मांस-मदिरा का सेवन होता था। मुसलमानों के सम्पर्क का सामाजिक रीति-रिवाजों और भोजन पर भी प्रभाव पड़ा। आरम्भ में दोनों के सम्बन्ध कटु रहे। मन्दिरों के विनाश और बलपूर्वक धर्म-परिवर्तन ने एक नयी उथल-पुथल पैदा कर दी। समाज में प्रायश्चित के विधान द्वारा हिन्दू से मुसलमान बने हुए व्यक्तियों को पुन: हिन्दू धर्म में दीक्षित करने के अनेक प्रयास हुए। परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में पुरोहितों ने शुद्धि को प्रोत्साहन देना बन्द कर दिया और इस कारण हिन्दुओं का इस्लाम धर्म स्वीकार करने के बाद पुनः हिन्दू धर्म में लौटना कठिन हो गया।

जीवन-स्तर- राजा, उसके मन्त्री और सामंत शान-शौकत का जीवन बिताते थे। वे विशाल भवनों में रहते थे, बढ़िया वस्त्र धारण करते थे और बहुमूल्य आभूषणों को धारण करते थे। इनके परिवार में अनेक स्त्रियां होती थीं। राज-परिवार और सामन्तों के घरों में बड़ी संख्या में नौकर-चाकर होते थे। व्यापारी वर्ग समृद्ध था।

व्यापारी रहन-सहन में सामन्तों की नकल करते थे। नगरों में रहने वाले लोग भी आमतौर पर खुशहाल थे। परन्तु समाज में निर्धन वर्ग भी था। कृषक जनता की आर्थिक स्थिति साधारण थी। यद्यपि भूमिकर कम था, परन्तु किसान को अन्य कर भी देने पड़ते थे। दुर्भिक्ष भी समय-समय पर पड़ते थे और ऐसे समय अन्य स्थानों से सहायता पहुँचने पर निर्धन लोगों को भूखों मरना पड़ता था। इस प्रकार धनी और निर्धन व्यक्ति के जीवन-स्तर में महान् अन्तर था।

स्त्रियों की दशा- इस काल में स्त्रियों के सामाजिक स्तर में गिरावट आयी। नारी की स्वतंत्रता पर अनेक अंकुश लग गये। बचपन में उसे पिता पर और युवावस्था में पति पर निर्भर रहना होता था। कन्या को अपना जीवन-साथी चुनने की स्वतंत्रता थी। स्वयंवर का प्रचलन था। इस काल में कन्या के विवाह की आयु कम कर दी गयी और यह कहा गया कि युवावस्था से पूर्व कन्या का विवाह कर देना चाहिए। बारहवीं शताब्दी में तुर्कों द्वारा स्त्रियों के अपहरण को रोकने के लिए कन्या के विवाह की आयु और कम कर दी गई। समाज में पर्दे की प्रथा का प्रचलन नहीं था, परन्तु कालान्तर में मुस्लिम सम्पर्क के कारण पर्दे की प्रथा का प्रचलन हो गया जिससे नारी जाति की उन्नति अवरुद्ध हो गयी।

समाज में सती प्रथा का प्रचलन था। पति की मृत्यु के बाद पत्नी उसकी चिता पर जलकर भस्म हो जाती थी। अरब लेखक सुलेमान के अनुसार, राजा की मृत्यु पर उसकी रानियाँ भी उसकी चिता के साथ सती हो जाती थीं। राजपूतों में जौहर की प्रथा प्रचलित थी। जब राजपूत विजय की आशा नहीं देखते थे, तब केसरिया वस्त्र धारण कर शत्रु पर टूट पड़ते थे और स्त्रियाँ अपने सतीत्व की रक्षा के लिये सामूहिक रूप से जल जाती थीं। इस प्रथा को जौहर कहते थे।

शिक्षा

बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा मन्दिरों में बनी पाठशालाओं में या गुरु के घर पर दी जाती थी। संस्कृत के स्थान पर बोलचाल की भाषा हिन्दी का प्रचलन हो गया था। बच्चों को अक्षरज्ञान के साथ गणित भी सिखाया जाता था। उच्च शिक्षा के लिये बड़े-बड़े नगरों में महाविद्यालय खोले गये, जहाँ पर विद्यार्थी दूर-दूर से पढ़ने आते थे। नालन्दा विश्वविद्यालय अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय था जहाँ चीन, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्वी द्वीपसमूह से बड़ी संख्या में विद्यार्थी आते थे। विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भोजन और वस्त्र की व्यवस्था राज्य की ओर से होती थी।

आयुर्वेदविज्ञान की शिक्षा भी दी जाती थी। आयुर्वेद में शल्य-चिकित्सा (सर्जरी) की भी शिक्षा दी जाती थी। मनुष्य-चिकित्सा के अतिरिक्त पशु-चिकित्सा की शिक्षा भी दी जाती थी। राजकुमारों और सामंत-पुत्रों को सैनिक शिक्षा दी जाती थी।

इस काल में स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में गिरावट आयी। लड़की के विवाह की आयु कम कर दिये जाने के कारण उसे शिक्षा मिलना कठिन हो गया। राजघरानों और धनी परिवारों की लड़कियों को घरों पर ही शिक्षा दी जाने लगी। शिक्षा की कमी के कारण नारी का सम्मान भी कम हो गया।

इस काल में विद्वानों का दृष्टिकोण अधिक संकीर्ण हो गया। उन्होंने विदेशों से वैज्ञानिक विचारों को ग्रहण करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। नये विचारों को ग्रहण करने के स्थान पर वे अपने प्राचीन विचार पर ही निर्भर थे। प्रसिद्ध विद्वान् अलबेरूनी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि हिन्दू यह समझते हैं कि उनके अलावा किसी को विज्ञान का ज्ञान नहीं है और उनके समान विदेशों में कोई विद्वान् है। इसी कारण उसने ब्राह्मण को घमण्डी, दम्भी और संकीर्ण प्रवृति का बतलाया है। इस प्रवृति से समाज को हानि हुई। इस समय दक्षिण भारत में ये विश्वविद्यालय प्रसिद्ध थे - इन्नाइरम, त्रिभुवनी, तिरूवादुतुराई और तिरूवरियूरा।

चूंकि शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा तमिल होकर संस्कृत थी इसलिए महाविद्यालय में अध्ययन करने वाले अधिकांश विद्यार्थियों का दैनिक जीवन से संपर्क टूट जाता था।

 


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